209. अनासक्ति की कुल्हाड़ी
श्रीकृष्ण
ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की जहाँ
मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण
हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त
होने के लिए ‘अनासक्ति की कुल्हाड़ी’ का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)।
अनासक्ति
भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण
ने कई अवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर हम लोगों, वस्तुओं,
भावनाओं, विचारों और विश्वासों से आसक्त होते
हैं। हमारी कई मान्यताएँ
अवैज्ञानिक मिथकों,
तर्कहीन मान्यताओं या अपुष्ट सूचनाओं पर आधारित होती हैं। एक अच्छा शिक्षार्थी बनने के लिए श्रीकृष्ण के द्वारा बताए गए 'प्रश्न
पूछने' के गुण को विकसित करके व्यक्ति उनसे अनासक्ति प्राप्त कर सकता है (4.34)। जबकि हमें अनासक्ति के बारे में बताया जाता है हम
विरक्ति या यहाँ तक कि
घृणा की ओर आकर्षित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने हमें क्षमा जैसे दैवी गुण (16.3)
को विकसित करके घृणा त्यागने के लिए कहा है।
हमें
आसक्ति से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि यह लंबे समय से हमारे द्वारा
पोषित की गई है और यह हमारा एक हिस्सा बन जाती है। इसका
मूल संदेश यह है कि आसक्ति को त्यागना
है लेकिन वस्तुओं और संबंधों को तोड़ना नहीं है। वास्तव
में, इसका अर्थ है किसी भी परिस्थिति में आसक्ति के बिना अपना सर्वश्रेष्ठ करना।
श्रीकृष्ण
कहते हैं “इस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वास्तविक
स्वरूप, इसका आदि,
इसका अंत और इसकी निरन्तरता के रूप -इनमें से कुछ भी
सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता। अनासक्ति की प्रबल कुल्हाड़ी से इसे काटकर इस वृक्ष के मूल को खोजना चाहिए जो कि परमेश्वर हैं जिनसे बहुत समय पहले ब्रह्माण्ड की
गतिविधियाँ प्रवाहित हुई थीं। उनकी शरण में आने पर मनुष्य
इस संसार में पुनः नहीं लौटेगा” (15.3 और 15.4)।
एक
बार जब कोई अनासक्ति की कुल्हाड़ी के बारे में अवगत हो जाता है तो वृक्ष के मूल अर्थात्
परमात्मा की खोज शुरू हो जाती है।

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