226. गुण और श्रद्धा
विज्ञान
की शिक्षा एक विद्यार्थी की अज्ञानता को मिटाकर
भौतिक दुनिया के बारे में जागरूकता पैदा करती है। उदाहरण के लिए नीचे की ओर छेद वाले एक जलाशय (water tank) के खाली
होने में लगने वाले समय की गणना विद्यार्थी के स्तर के अनुसार भिन्न
होगी। सातवीं कक्षा के विद्यार्थी को
टंकी के कुल आयतन (volume) को छेद की निकासी क्षमता से
विभाजित करना सिखाया जाता है। जबकि बारहवीं
कक्षा के विद्यार्थी से हल निकालने के लिए
गुरुत्वाकर्षण को ध्यान में रखते हुए कलन
शास्त्र (calculus) का उपयोग करना सिखाया जाता
है। स्वाभाविक रूप से, दोनों के उत्तर भिन्न
होंगे और यह पूर्णतः स्वीकार्य है क्योंकि सातवीं कक्षा के विद्यार्थी
से जटिल कलन शास्त्र समीकरण हल करने की अपेक्षा
नहीं की जाती।
इसी
प्रकार की परिस्थितियाँ आध्यात्मिक मार्ग पर भी उत्पन्न होती हैं जहाँ उपदेश साधक के ज्ञान के स्तर
के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप में दिए जाते हैं। भगवद्गीता ऐसे सभी स्थितियों
को संभालती है जैसे कोई पाठ्यपुस्तक प्राथमिक
शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक
ज्ञान प्रदान करती है।
सोलहवें और सत्रहवें अध्याय में विषयों को समझाने के लिए श्रीकृष्ण स्वयं एक प्रारम्भिक के स्तर पर
आते हैं।
दैवी
और आसुरी प्रकृति की व्याख्या करने के बाद, वे मार्गदर्शन के लिए
शास्त्रों का उपयोग करने का सुझाव देते हैं। यह सलाह आसुरी प्रकृति वालों के लिए
है जो ज्ञान के सबसे निचले स्तर पर हैं। इसी तरह वे
अज्ञानियों के लिए गुणों (प्रकृति जनित स्वभाव) पर आधारित विभिन्न व्यवहारों की
व्याख्या से सत्रहवें अध्याय की शुरुआत करते हैं। उन्होंने ‘जागरूक’ लोगों को गुणातीत अवस्था अर्थात्
इच्छारहित स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया था।
श्रद्धा
का अर्थ है सत्य में स्थिर रहना अथवा सत्य का आश्रय लेना। श्रद्धा के संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं
“सात्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं; राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं; और तामसिक लोग भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं”
(17.4)। ये इच्छाओं की पूर्ति के साधन हैं।
श्रीकृष्ण
आगे सावधान करते हुए कहते हैं “जो लोग शास्त्रविधि से रहित भयावह तपस्या करते हैं, उन्हें आसुरी प्रकृति का जानो। वे पाखंडी, अहंकारी (कर्तापन के अभिमान वाले); काम, आसक्ति और बल के उन्माद से
ग्रस्त होकर अविवेकपूर्वक शरीर के तत्वों को यातना देते हैं और साथ
ही मुझको भी अपमानित करते हैं” (17.5 और 17.6)।

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